...चलो आज फिर तुम सज गईं

चलो आज फिर तुम सज गईं 

आज फिर तुमने पहन लिए कान में झुमके 

हाथों में सुनहरी चूड़ी 

आज फिर तुम एक खुशबूदार इत्र लगाकर महक गईं 

आज फिर किसी के नाम की बिंदी लगा ली 
और लाज की चुनरी सजा ली 

 

मुबारक हो, 

क्योंकि आज फिर तुमने अपनी पहचान खो दी 

हथेली का छाला दिखाने के बजाय मेहंदी रचा ली 

चूड़ियों की गुमनाम बेड़ियाँ लगा ली 

और सिर उठाने का एक और मौका गंवा दिया 

 

तुम आंखें तरेर सकती थी 

तुम आवाज उठा सकती थी अपने हक को बचा सकती थी 

 

लेकिन ईमान तुम्हारा सह गया, 

खुद के लिए खड़े होने का एक और मौका रह गया

 

आज फिर तुमने कदम रोक लिए 

अपनी पहचान बनाने के बजाय पराठों में मक्खन लगा दिया, भरवा करेला बना दिया 

 

दुनिया में बढ़ने की मोहलत थी तुम्हारे पास 

पर आज फिर खुद को घर के मसालों में फंसा लिया 

 

आज फिर तुमने अपनी बेटी को उड़ने की इजाज़त तो दी 

पर आज फिर, उसको मर्दों से दबना सिखा दिया 

 

बधाई हो कि तुम आज सज गईं 

बधाई हो कि तुम आज फिर डर गईं, चलते-चलते रुक गईं 

 

पर अब रुक ही गई हो तो पीछे मुड़ कर किसी पुरुष को मत ढूंढना 

 

अकेली ही काफी हो
बस एक पानी की बोतल उठाना
और खुद के साथ चलना 

 

-साशा सौवीर



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