Tuesday, May 16, 2017

रैनसमवेयर के बारे मेें जानिए सबकुछ...

रैनसम वायरस ने दुनिया के कई देशों पर अटैक कर दिया है और यह साइबर अटैक भारत पर भी भारी पड़ता दिख रहा है। ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि यह वायरस क्‍या है और इससे आम लोग अपने कम्‍प्‍यूटर का बचाव कैसे करें।

आज हम बताते हैं रैनसमवेयर के बारे में

यह एक किस्‍म का प्रोग्राम है जो कम्प्यूटर की किसी फाइल को लॉक कर देता है और बाद में उसे छुड़ाने के लिए फिरौती देनी होती है। यूरोपियन यूनियन की पुलिस यूरोपोल के मुताबिक रैनसमवेयर नई चीज़ नहीं हैलेकिन वानाक्राइ” वायरस का ये हमला अभूतपूर्व”  है।

रविवार को ये कहा गया कि 150 देशों में इस वायरस ने दो लाख से ज्यादा शिकार किए हैं। माना जा रहा है कि ये आंकड़े बढ़ भी सकते हैं।

पैदा हो सकते हैं कई अन्‍य वायरस

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि रैनसमवेयर वायरस के कई प्रकार हैं इसलिए इन सब के बीच वह सब भी विकराल रूप ले सकते हैं। हालांकि एनएचएस ने अभी तक ये जानकारी नहीं दी है कि इसे वापस पटरी पर कैसे लाया गया। इस वायरस को बनाने वाले लोग अभी तक ज्यादा मुनाफा नहीं कमा सके हैं।

एक मीडिया हाउस की पड़ताल में पाया गया कि फ़िरौती की रकम वसूलने के लिए जो ई-वॉलेट बनाया गया हैउसमें वर्चुअल करेंसी में 30,000 डॉलर की रकम अभी तक जमा हो पाई है। हर शिकार कम्प्यूटर के लिए वायरस के ज़रिए लोगों से वर्चुअल करेंसी बिटक्वॉयन में 300 डॉलर की रकम मांगी जा रही है।

इससे पता चलता है कि रैनसमवेयर के शिकार हुए ज़्यादातर लोगों ने फ़िरौती की रकम नहीं चुकाई है।
वानाक्राइ” वायरस केवल उन्हीं कम्प्यूटरों को अपना शिकार बनाता है जो विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलते हैं। अगर आप अपना विंडोज़ अपडेट नहीं करतेई-मेल खोलते या पढ़ते वक्त एहतियात नहीं बरतते तो आप को ख़तरा हो सकता है। हालांकि घरेलू कामों में यूज़ किए जाने वाले कम्प्यूटरों पर अपेक्षाकृत कम खतरे की बात कही जा रही है।


ऐसे बचाएं अपना सिस्‍टम

आप अपना सिस्टम अपडेट करकेफारवॉल और एंटीवायरस का इस्तेमाल करके खुद को सुरक्षित रख सकते हैं। ईमेल पढ़ते वक्त अलर्ट रहें। डेटा का बैकअप नियमित रूप से मेनटेन रखें।


फिरौती चुका भी देंगे तो भी कोई गारंटी नहीं

रैनसमवेयर के शिकार हुए लोगों को ये समझना चाहिए कि फिरौती की रकम चुका देने पर भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आपकी फाइल अनलॉक हो जाएगी।
साइबर चोरों के लिए रैनसमवेयर एक पसंदीदा हथियार है। इसके जरिए वे अपने मुनाफ़े को तेजी से ठिकाने लगा सकते हैं। वर्चुअल करेंसी बिटक्वॉयन के जरिए सुरक्षा एजेंसियों का उनतक पहुंचना मुश्किल होता है।
हालांकि ये बात थोड़ी असामान्य जरूर लगती है कि जानकार अपराधियों का एक गिरोह फिरौती उगाहने के लिए बिटक्वॉयन का इस्तेमाल कर रहा है।

अन्‍य खबरें पढ़िए www.therisingnews.com

Tuesday, July 28, 2015

धर्म हैं, पथ हैं, जीवन-दर्शन हैं कलाम


कलाम व्यक्ति नहीं, विचार हैं। धर्म होता है कलाम। नीति का नाम होता है कलाम। जीवन-दर्शन का प्रतीक होता है कलाम। जिजीविषा में जो गूदा होता है, वही कलाम कहलाता है। जो हम सब में मौजूद होते हैं। जरूरत यह है कि हम खुद में कलामों को खोजें। उन्हें पुष्पित-पल्वित करें, और कोशिश करें कि आने वाली पीढियों में उगने वाले कलामों को खाद-पानी मिलता ही रहे।

अपने जीवन काल में कलाम छात्रों के बीच ही घिरे रहना पसंद करते थे। किसी संस्‍था का उद्घाटन समारोह का बुलावा भले ही न स्‍वीकारें,  विद्यार्थियों के पुकारने पर बड़े चाव से चले जाते थे। लेक्‍चर, सेमिनार, दीक्षांत में मंच संभालना उनको पसंद था।  कारण वही, कि प्रिय बच्‍चों के बीच में जाकर कहे गए अनेक शब्‍दों में अगर दो शब्‍द भी आत्‍मसात कर लें तो हर गली, हर मुहल्‍ले में एक कलाम उठ खड़ा होगा। ऐसे थे हमारे कलाम। लोभ, राजनीति, आरोप-प्रत्‍यारोप से परे, जिन्‍होंने एक सफल भारत का सपना देखा था। ऐसी विभूति की मत्‍यु अगर छात्रों के बीच ही हुई तो मेरी समझ में जैसे उनकी आखिरी ख्‍वाहिश पूरी हो गई। 83 साल के नवयुवक थे कलाम, बुजुर्ग तो बिलकुल भी नहीं थे, और सबसे बड़ी बात कि इतने भले चंगे थे कि चलने के लिए किसी की सहायता भी नहीं लेनी पड़ी। उन्‍होंने तो अपने जीवन में सारे काम कर लिए लेकिन हमारे लिए तो उनका जाना जैसे देश का विधवा हो जाना। कहने की जरूरत नहीं कि भारत के लिए यह बहुत बड़ी क्षति है।

खैर, मैं उन खुशकिस्‍मतों में से एक हूं जिसे उनसे मिलने का सौभाग्‍य एक नहीं बल्कि दो-दो बार प्राप्‍त हो चुका है। एक पुस्‍तक मेले के उद्घाटन पर और दूसरा साहित्यिक मेले में। अभी पिछले ही साल की बात है। एक लिटरेचर फेस्टिवल में उनका लखनऊ आना हुआ था। इंदिरा गांधी प्रतिष्‍ठान में खचाखच भीड़ थी, करीब पांच स्‍कूल के बच्‍चे वहां उपस्थित थे। मंच पर आते ही कलाम साहब ने मीठी सी मुस्‍कान के साथ कहा, कि कई दिनों से आराम करने की फुर्सत नहीं मिली, आज सुबह तड़के ही निकलना पड़ा। यहां-वहां के काम निपटाने के बाद सीधे लखनऊ रवाना हो गया। लेकिन बच्‍चों को देखते ही मैं तरोताजा हो जाता हूं। सारी थकान जाने कहां चली जाती है।

ऐसा केवल कलाम साहब ही कह सकते थे, उनकी तो पूरी जिंदगी ही बच्‍चों को समर्पित थी। वह जहां से उठे थे जीवन भर उसी धरती पर ही टिके रहे। चमक-धमक उनपर कभी हावी नहीं होने पाई। कार्यकाल पूरा होने पर राष्‍ट्रपति भवन से केवल अपने कपड़े लेकर ही निकले थे। पूछने पर बताया कि यह शील्‍ड और प्रतीकचिह्न तो देश के राष्‍ट्रपति को मिला था, मुझे नहीं।

मेरे पिता जी बताते हैं कि बात सन 2005 की है। पिताजी दैनिक हिनदुस्‍तान संस्‍करण में कार्यरत था। वाराणसी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय का वार्षिेकोत्‍सव प्रारम्‍भ शुरू हो चुका था। सैकड़ों शिक्षकों की लयबद्ध सर्पीली दोहरी कतार-लकीर की तरह धीरे-धीरे आगे बढ रहे थे। वह इसके महान आयोजन के क्षण-क्षण को देख-सहेट करने में तत्‍पर थे।

सब की निगाहें केवल मुख्य अतिथि को ही खोज रही थीं। अचानक सीढियों पर चढ़ते कलाम दिख गये। जबर्दस्‍त शोर का बगुला सा उठा।

पदक वितरित करने का वक्‍त आ गया। पहली पाली में सर्वश्रेष्‍ठ तीन शिक्षार्थियों को मंच पर बुलाया गया। इनमें पहला नाम था एक छात्रा का। कलाम ने उसे उसकी श्रेष्‍ठता का प्रमाण-पत्र और पदक थमाना चाहा, तो अचानक एक गजब हादसा-सा हो गया। इसके पहले कि कोई कुछ समझ पाये, वह बच्‍ची लपकी और सीधे कलाम के गले लग गयी।

प्रगाढ आलिंगन।
पूरा पाण्‍डाल स्‍तब्‍ध।
उपस्थित सारे लोग सकपका गये।
लेकिन कलाम बेहद शांत थे। वह बच्‍ची कलाम को चूम रही थी,  और कलाम सहज थे।
बाद में उस बच्‍ची का ज्‍वार उतरा। सफलता की दमक उसके चेहरे पर साफ चमक रही थी।
मगर कलाम कुछ नहीं बोले। नि:शब्‍द।
वह बच्‍ची ही बोली:- "दरअसल मैं अपनी आंटी के लिए राष्‍ट्रपति महोदय को चूमना चाहती थी।"
और इसीलिए अपने आवेगों को रोक नहीं पायी।
अब बारी थी कलाम जी की। बोले:-
"माता जी को भी मेरा स्‍नेह दे दीजिएगा।"

विजन 20-20 का सपना संजोने वाले कलाम अब हमारे बीच नहीं रहे। करोड़ों आंखों में अश्रु छोड़ कर वह चले गए। लेकिन हां, दे गए तो प्रेरणा, जिजीविषा और कुछ कर गुजरने का जज्‍बा भी। साथ ही अपना काम करते हुए विवादित न रहने की तरकीब भी सुझा गए, यानी एक सरल शख्सियत। देखना यह है कि हमारे राजनेता,  जो उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उमड़-घुमड़ रहे हैं,  उनके ख्वांब को पूरा करने के लिए कितने व्याकुल हैं। आखिर उन्हीं का तो दायित्व है विजन 20-20 को बरकरार रखना। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हमारे नीति-नियंता उनके सपने का भारत बनाने के लिए प्रतिबद्ध हों। डॉ.कलाम, यह राष्ट्र सदैव आपका ऋणी रहेगा। 

Thursday, July 23, 2015

एक असुरक्षित समाज और भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था

बाराबंकी में कोठी थाने परिसर में एक महिला को जिन्दा फूंक डाला गया। बुरी तरह जल चुकी महिला ने मरने के पहले बयान दिया था कि पुलिसवालों ने पहले तो उसके साथ बलात्कार की कोशिश की, और जब उसने विरोध किया तो पुलिसवालों ने उसे जिन्दा फूंक दिया। अगले दिन लखनऊ में इस महिला ने दम तोड़ दिया।
मोहनलालगंज में शिक्षिका पर एसिड फेंका गया। बाल-बाल बच गई, पर झुलस सकती थी। अपना रंग- रूप खो सकती थी। सबसे बड़ी बात अंतरआत्मा नष्ट हो सकती थी उसकी, लेकिन बचने के बाद भी क्या कुछ बचा होगा उसके पास? घर से बाहर निकल भी जाए तो पीछे से हर गुजरने वाली बाइक की आवाज सुन कर रूह कांप उठती होगी उसकी। समाज को दिशा देने वाली शिक्षिका को भी नहीं बख्शा इन मनचलों ने।
फिर हम भरोसा किस पर करें?
पुलिस पर? कहीं नोंच खसोट पर पुलिस ही न खा जाए। समाज पर? जो खड़ा खड़ा केवल तमाशा देख लेता है। या फिर सिस्टम का? जो बस केवल निलंबन कर सकता है, वो भी बेवजह। असल गुनहगारों का तो बाल भी बांका नहीं होता।
नहीं नहीं जाओ। मैं नहीं मानती ऐसी व्यावस्था को। हरगिज नहीं। अपनी व्यवस्था तो मैं खुद ही बनाऊंगी। मुझे सुरक्षित रहने के लिए तुम्हारी घटिया व्यवस्था की तो बिलकुल जरूरत नहीं। मेरे पिता द्वारा दिया गया आत्मविश्वास काफी है मेरी हिफाजत के लिए। बाकी देख लिया जाएगा।
चेतावनी-बस जरा महिलाओं की इज्जत करना सीख जाओ, कहीं हमारा ‘थोबड़ा बिगाड़ो’ अभियान शुरू हो गया तो तुम्‍हारा तेल निकाल देंगे। फिर मत कहना।



Sunday, July 12, 2015

चलो एक बार फिर तुमसे दूर चलते हैं...

चलो एक बार फिर तुमसे दूर चलते हैं...
कोशिश ही सही पर ये भी करते हैं...
जहां तुम्हारी बातों का शोर नहीं हो...
खिलखिलाती मुस्कान का कोई ओर छोर नहीं हो...
तुम्हारे प्यार की खुशबू ना मिले...
अपनी यादों को मिट्टी में दफ़न कर के ...
सारी फरयादों को सीने में दबाकर के ...
चलो एक बार फिर तुमसे दूर चलते हैं ...
तुम्हारा प्यारा चेहरा न दिखे ...
मुझपर तुम्हारी चिंता का पहरा ना दिखे...
मेरे घाव को मलहम भी न लगाना फिर ...
इस शर्त पे, कि लौट के वापस ना बुलाना फिर ...
चलो एक बार फिर तुमसे दूर चलते हैं ...
कोशिश ही सही पर ये भी करते हैं
                            -Sasha

                                       

Saturday, May 16, 2015

हैट्स ऑफ हॉलीवुड

मैं बहुत ज्‍यादा हॉलीवुड फिल्‍में नहीं देखती। कारण मुझे रोमांटिक और पारि‍वारिक फिल्‍में पसंद हैं। एक्‍शन से दूर ही रहती हूं, और हॉलीवुड के लिए मित्रों से हमेशा सुना है कि उसमें हिंदी पिक्‍चरों जैसा बोगस रोमांस नहीं होता, बात-बात पर गाने भी नहीं होते। दो-टूक अपनी बात कहकर खत्‍म हो जाती हैं हॉलीवु‍ड फिल्‍में। मुझे ऐसा बिलकुल पसंद नहीं। फिल्‍म तीन घंटे की न हो तो बेकार है। लव ट्राइंगल न हो तो क्‍या मजा। और गाने, भई गाने तो मूवी की जान होते हैं। इसीलिए हॉलीवुड को नापसंद करती थी। लेकिन कल रात को नींद आंखों को छूने का नाम ही नहीं ले रही थी। तमाम करवटें और फोन पर जमकर सुडोकू खेल चुकने के बाद भी मैं निद्रावस्‍था की ओर प्रस्‍थान करने में असमर्थ थी। हार कर अपने अजीज साथी लैपटॉप को खोल लिया। पूरा खंगाल डाला तब जाकर डी ड्राइव में एक जेम्‍स बांड की फिल्‍म दिखाई दी कसीनो रॉयल। नींद नहीं आ रही थी और कोई ऑप्‍शन भी नहीं था। फट से लैपटॉप में इयरफोन अटैच किया और फिल्‍म शुरू। पहली बार मुझे जेम्‍स बांड के दर्शन हुए। शुरुआत बोरिंग थी पर बाद में मजा आने लगा। छोटी-छोटी बातों से सामने वाले का झूठ पकड लेता है। दम तो है बंदे में। फिल्‍म के बीच में बेहद कम कपडों में एक लडकी दिखाई दी। बांड ने अपने गुप्‍त मिशन के तहत उसका इस्‍तेमाल किया और उसे भी अजनबी मर्द के साथ जाने में कोई गुरेज नहीं था। सच में अंग्रेजी फिल्‍मों में इमोशंस नहीं होते, मैंने सोचा। करीब 45 मिनट की फिल्‍म के बाद बांड की मुलाकात एक और लडकी से हुई, नाम था वेस्‍पर। बांड ने वेस्‍पर की पहली ही मीटिंग में जमकर बेइज्‍जती की। इतनी कि अगर मैं वेस्‍पर की जगह होती तो एक तमाचा जरूर रसीद देती। लेकिन वेस्‍पर ने अपने अंदाज में बांड की दुगनी धो दी। मजेदार सीन था। इत्‍तेफाक ये था कि एक दूसरे को नापसंद करने के बावजूद दोनों को साथ में किसी मिशन पर जाना था। कुछ दिनों तक दोनों में खूब नोंझकोंक हुई। इन तकरार में भी कहीं न कहीं प्‍यार जरूर था, ऐसा मुझे लगा क्‍योंकि मैं बॉलीवुड देख देख के हर बात पर रोमांस निकाल लेती हूं। इसी बीच मम्‍मी के चिल्‍लाने की आवाज आई कि सो जाओ। डर के मारे मैंने लैपटॉप तो बंद कर दिया लेकिन मन कसीनो रॉयल में ही लगा रहा। अगले दिन मौका मिलते ही ऑफिस में ही फिल्‍म निपटा दी। (मेरे बॉस को ना पता चले वरना मेरी लंका लग जाएगी)
फिल्‍म आगे बढती रही और मेरी दिलचस्‍पी भी। इसमें कोई शक नहीं कि हॉलीवुड फिल्‍मों की क्‍वालिटी हमसे बेहतर होती है। एक सीन ऐसा आया कि वेस्‍पर को कुछ आतंकवादियों ने जकड लिया और बांड ने जान पर खेल कर उसे बचाया। इसी बीच एक आतंकवादी की जान भी चली गई। वेस्‍पर ये देख कर सदमे में आ गई और यहां से कहानी में रोमांस का छौंका लगा। बांड रूम में पहुंचता है और देखता है कि डरी सहमी सी वेस्‍पर उन्‍हीं कपडो में शावर के नीचे बैठी भीग रही है। बांड को देखते ही धीमे से कहती है कि खून के निशान अभी भी नाखूनों से नहीं मिट रहे। बडे प्‍यार से बांड उसकी उंगलियों को सहला कर कहता है कि सब ठीक हैऔर ऐसे शुरू हुई दोनों की प्रेम कहानी। बीच में कई बार बांड वेस्‍पर के लिए जोखिम उठाता है। वेस्‍पर भी उसे बहुत प्‍यार देती है। अंत में उसके साथ एक सुकून भरी जिंदगी गुजारने के लिए इस्तीफा भी लिख देता है। फिल्‍म में जितने मजेदार एक्‍शन सीन्‍स थे उससे लाख गुना बेहतर रोमाटिंग डॉयलॉग थे। बांड जैसे सख्‍त और कठोर शख्‍स ने जैसे वेस्‍पर के आगे अपना दिल ही निकाल के रख दिया हो। फिल्‍म के आखिर में वेस्‍पर की मौत के बाद यह जान कर वह वह एक बेवफा थी बांड बुरी तरह टूट जाता है, लेकिन अगले ही पल एक नए मिशन के लिए उसकी तैयारी शुरू हो जाती है। 

हैट्स ऑफ हॉलीवुड स्‍टोरी से लेकर डायलॉग, डायरेक्‍शन और हर चीज में ग्रेट। बॉलीवुड अभी तुमसे मीलों दूर है। 

Sunday, May 6, 2012

बिल गेट्स से बिल ग्राम तक


बिल गेट्स से बिल ग्राम तक... चौंकिए मत, ये आविष्‍कारों की भेड़चाल में कोई नया नाम नहीं है, इसे मेरे साथ हुए एक अनुभव का बखान करने के लिए इस्‍तेमाल किया गया एक हेल्पिंग वाक्‍य समझ लीजिए जो कि हमारे इनपुट हेड संजीव मिश्रा सर ने मुझे कहा। दैनिक जागरण के 1 साल के प्रशिक्षण के पहले के 3 महीने जनरल डेस्‍क पर मैंने देश विदेश पेज बहुत ही लगन से बनाए। लगन के अलावा मुझे आदत हो चुकी थी देश और विदेश की बड़ी बड़ी और आकर्षक खबरे अच्‍छी फोटो के साथ सजा के लगाने की। अचानक ही मुझे 3 दिन पहले जिलों की खबरों के साथ जूझने के लिए डाक डेस्‍क भेज दिया गया । जब पहले मैंने डाक की खबरें पढ़नी शुरू की तो मुझे लगा कि पैरों तले जमीन खिसक गई। तीन महीने बिग बी, ओसामा, सू की, हिलेरी क्लिंटन की खबरे लगाने के बाद अचानक पति द्वारा पत्नी की हत्‍या की, नवविवाहिता के साथ दुराचार की, आत्‍महत्‍या, किसानों के प्रदर्शन जैसी खबरें मेरे हाथों में थमा दी।
पहले ही दिन मुझे अकेले हरदोई जिला सम्‍हालने को मिल गया। अंबिका सर के अलावा कोई भी नहीं था बताने के लिए कि कौन सी खबर लीड लगने लायक है और कौन सी बाटम। अब अंबिका सर तो ठहरे डेस्‍क इंचार्ज, कहां तक मुझे समझाते रहेंगे। मुझे खुद ही सब कुछ सीखना पड़ेगा मैं यह 3 दिनों में बखूबी समझ चुकी हूं। पहले तो मुझे वहां का माहौल और काम करने के तरीके समझने में थोड़ी परेशानी हुई, पर 3 दिन काफी होते हैं अपने आप को कहीं पर भी ढालने के लिए।
डाक पर आने से मैं पहले तो बहुत डरी हुई थी, पर यहां आ कर मैं जमीन से जुड़ी हुई वास्‍तविक घटनाओं से रूबरू हुर्इ्र। देश तो बहुत आगे बढ़ गया है, शिक्षा में, यहां तक कि जनसंख्‍या में भी, अग्नि 5 तक बना लिया हमने, पोलियों से जूझ रहे देशों की सूची में से भी हमारा नाम हट गया.. पर क्‍या अपने अंदर झांक कर देखा? क्‍या ये जानने की कोशिश की कि हमने पाया क्‍या?
आज भी दहेज ना मिलने पर बहू को जिंदा जला दिया जाता है। आज भी न‍वविवाहिता के साथ दुराचार होता है। खेलने कूदने की उम्र में बालिका के साथ सामूहिक बलात्‍कार होता है। शराब पी कर गर्भवती को इस कदर मारा जाता है कि उसका गर्भपात हो जाता है। जहां एक ओर एश्‍वर्या राय बच्‍चन की बेटी के इस संसार में आने पर खुशियां मनाई गई थीं, दुआएं दी गईं थीं वहीं दूसरी ओर हरदोई में गरीब घर के 3 नवजात शिशुओं की मौत हो जाती है, केवल अस्‍पताल कर्मचारियों की लापरवाही से। यह सब पढ़ कर दिल दहल जाता है रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वाकई बहुत फर्क है उस जीवन में जो हम जी रहे हैं और उस जीवन में जिसको जीने की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती।
 हमनें अग्नि 5 जैसी मिसाइल तो तैयार कर लीं पर शायद देश की नींव पर ही ध्‍यान देना भूल गए। पाकिस्‍तान की ओर दोस्‍ती का हाथ तो बढ़ा दिया पर अपनों की ओर से वो हाथ खींच लिया।
मुझे तो लगा कि अचानक जेनरल डेस्‍क से डाक डेस्‍क पर लाकर मुझे क्‍यों पटका जा रहा है पर अब सोचती हूं तो समझ में आता है कि दूसरों को जानने से पहले खुद को जानने की जरूरत होती है जो शायद मुझे डाक डेस्‍क के अलावा कहीं सीखने को न मिले। वाकई ये सफर बिल गेट्स से बिल ग्राम तक ही है। अचानक आसमान से उतार कर जमीन पर रख देने वाला यह मेरा सफर एक बेहतरीन सुबह बन कर आया है और मैं इसे बोझ समझ कर नहीं बल्कि अपनत्‍व से निभाउंगी।



Thursday, April 12, 2012

पहले ऑफिस की पहली पीड़ा





बड़े बड़े सपने तो सब देख ही लेते हैं, खुशनसीब होते हैं वो जो उन्‍हें पा लेते हैं मैंने भी एक सपना देखा है एक बहुत बड़ा पत्रकार बनने का और उसके लिए पहली साढ़ी पर कदम भी रख चुकी हूं. आज से तीन महीने पहले दैनिक जागरण में मेरा चयन हुआ था, पूरे भारत में आयोजित हुई एक परीक्षा को पास कर के मैंने दैनिक जागरण लखनउ में जीवन की पहली पारी खेलने आई थी. बहुत खुशी और बहुत ही जोश के साथ तीन महीने निकाल दिए, कोई फिक्र नहीं थीआशुतोष सर, आलोक सर, आफरोज सर, जितेंद्र सर, क्रांति सर जैसे दिग्‍गजों का हाथ सर पर था. हर दिन खुशी का बीत रहा था. समझ में नहीं आ रहा था कि लोग नौकरी में इतना तनाव क्‍यों ले‍ते हैं कि तभी अचानक आज कुछ हुआ मेरे साथ और मन मस्तिष्‍क तनाव से भर गया.
रोली मैम मेरी बड़ी बहन जैसी हैं और उनकी हर बात को माना है मैं ने, पर आज एक गलती या यूं कह लूं कि लापरवाही से उनका पारदर्शी दिल जैसे तोड़ दिया मैंने. उनका काम सही समय पर ना कर के मैंने ना केवल अपनी लापरवाही दिखा दी बल्कि यह भी समझ आ गया कि आख्रिर क्‍यों लोग इतना तनाव लेते हैं. आलोक सर ने जब हंसते हुए कहा कि रिर्पोंटिग के लक्षण नहीं हैं तुम्‍हारे, तो मेरा दिल जैसे धक से रह गयामजाक में ही सही पर बहुत बड़ी बात थी मेरे लिए
आज पूरे दिन मैंने यही सोचा कि कैसे रोली मैम से अपनी गलती की माफी मांगू? वह मुझे माफ करेंगी या नहीं? कहीं उन्‍होंने मुझे माफ नहीं किया तो? अगर डांट के वापसे भेज दिया तो?.. बहुत सोचा.. इतना सोचा कि कब 9 बज गया ध्‍यान ही नहीं दिया। इधर 9 बज चुके थे आलोक सर प्रादेशिक देश विदेश (जो कि मेरे जिम्‍मे था) का इंतजार कर रहे थे. और उधर रोली मैम की नाराजगी से मुझसे पानी भी नहीं पिया जा रहा था। थोड़ी देर के लिए वहां से ध्‍यान हटा के मैंने पेज बनाया और छोड़ा। उसके बाद सारे ख्‍याल दिमाग से निकाल कर मैं गई मैम के पास उनसे मिलने और अपनी गलती की माफी मांगने, पर व्‍यस्‍तता के कारण उनका मुझपर ध्‍यान नहीं गया। घर होता तो शायद रो देती पर एक मजबूत और हिम्‍मती पत्रकार बनने का सपना मेरे दिल में आ कर मुझे ताकत देता रहा और मैं यह सोच के वहां से आ गई कि कल फिर वापस आ कर उनसे माफी मांगूगी।
गलती तो मुझसे हुई है, पर सबसे बड़ी बात की मुझे खुशी है कि मैंने अपनी गलती मान के झुकना सीख‍ लिया है और गलती दोबारा ना हो इसकी भी एक सीख मिल गई है