Sunday, May 6, 2012

बिल गेट्स से बिल ग्राम तक


बिल गेट्स से बिल ग्राम तक... चौंकिए मत, ये आविष्‍कारों की भेड़चाल में कोई नया नाम नहीं है, इसे मेरे साथ हुए एक अनुभव का बखान करने के लिए इस्‍तेमाल किया गया एक हेल्पिंग वाक्‍य समझ लीजिए जो कि हमारे इनपुट हेड संजीव मिश्रा सर ने मुझे कहा। दैनिक जागरण के 1 साल के प्रशिक्षण के पहले के 3 महीने जनरल डेस्‍क पर मैंने देश विदेश पेज बहुत ही लगन से बनाए। लगन के अलावा मुझे आदत हो चुकी थी देश और विदेश की बड़ी बड़ी और आकर्षक खबरे अच्‍छी फोटो के साथ सजा के लगाने की। अचानक ही मुझे 3 दिन पहले जिलों की खबरों के साथ जूझने के लिए डाक डेस्‍क भेज दिया गया । जब पहले मैंने डाक की खबरें पढ़नी शुरू की तो मुझे लगा कि पैरों तले जमीन खिसक गई। तीन महीने बिग बी, ओसामा, सू की, हिलेरी क्लिंटन की खबरे लगाने के बाद अचानक पति द्वारा पत्नी की हत्‍या की, नवविवाहिता के साथ दुराचार की, आत्‍महत्‍या, किसानों के प्रदर्शन जैसी खबरें मेरे हाथों में थमा दी।
पहले ही दिन मुझे अकेले हरदोई जिला सम्‍हालने को मिल गया। अंबिका सर के अलावा कोई भी नहीं था बताने के लिए कि कौन सी खबर लीड लगने लायक है और कौन सी बाटम। अब अंबिका सर तो ठहरे डेस्‍क इंचार्ज, कहां तक मुझे समझाते रहेंगे। मुझे खुद ही सब कुछ सीखना पड़ेगा मैं यह 3 दिनों में बखूबी समझ चुकी हूं। पहले तो मुझे वहां का माहौल और काम करने के तरीके समझने में थोड़ी परेशानी हुई, पर 3 दिन काफी होते हैं अपने आप को कहीं पर भी ढालने के लिए।
डाक पर आने से मैं पहले तो बहुत डरी हुई थी, पर यहां आ कर मैं जमीन से जुड़ी हुई वास्‍तविक घटनाओं से रूबरू हुर्इ्र। देश तो बहुत आगे बढ़ गया है, शिक्षा में, यहां तक कि जनसंख्‍या में भी, अग्नि 5 तक बना लिया हमने, पोलियों से जूझ रहे देशों की सूची में से भी हमारा नाम हट गया.. पर क्‍या अपने अंदर झांक कर देखा? क्‍या ये जानने की कोशिश की कि हमने पाया क्‍या?
आज भी दहेज ना मिलने पर बहू को जिंदा जला दिया जाता है। आज भी न‍वविवाहिता के साथ दुराचार होता है। खेलने कूदने की उम्र में बालिका के साथ सामूहिक बलात्‍कार होता है। शराब पी कर गर्भवती को इस कदर मारा जाता है कि उसका गर्भपात हो जाता है। जहां एक ओर एश्‍वर्या राय बच्‍चन की बेटी के इस संसार में आने पर खुशियां मनाई गई थीं, दुआएं दी गईं थीं वहीं दूसरी ओर हरदोई में गरीब घर के 3 नवजात शिशुओं की मौत हो जाती है, केवल अस्‍पताल कर्मचारियों की लापरवाही से। यह सब पढ़ कर दिल दहल जाता है रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वाकई बहुत फर्क है उस जीवन में जो हम जी रहे हैं और उस जीवन में जिसको जीने की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती।
 हमनें अग्नि 5 जैसी मिसाइल तो तैयार कर लीं पर शायद देश की नींव पर ही ध्‍यान देना भूल गए। पाकिस्‍तान की ओर दोस्‍ती का हाथ तो बढ़ा दिया पर अपनों की ओर से वो हाथ खींच लिया।
मुझे तो लगा कि अचानक जेनरल डेस्‍क से डाक डेस्‍क पर लाकर मुझे क्‍यों पटका जा रहा है पर अब सोचती हूं तो समझ में आता है कि दूसरों को जानने से पहले खुद को जानने की जरूरत होती है जो शायद मुझे डाक डेस्‍क के अलावा कहीं सीखने को न मिले। वाकई ये सफर बिल गेट्स से बिल ग्राम तक ही है। अचानक आसमान से उतार कर जमीन पर रख देने वाला यह मेरा सफर एक बेहतरीन सुबह बन कर आया है और मैं इसे बोझ समझ कर नहीं बल्कि अपनत्‍व से निभाउंगी।



1 comment:

  1. very true!!
    we all need to look into these realities of life...there is need of change in many areas for country's prosperity and the time has come to take some steps in this regard...ppl need to think these problems and GOVERNMENT too.

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